जुर्माने की रकम तो आखिर भरनी पड़ेगी,
वक़्त की अदालत में हर साँस गवाही देगी।
जो बोया था कल हमने, वही फ़सल उगेगी,
कर्मों की किताब में कोई पंक्ति न मिटेगी।
झूठ की चमक चाहे कुछ पल को जगमगाए,
सच की धीमी लौ फिर भी राह दिखाए।
किस्मत को दोष देकर कब तक बचोगे तुम,
अपने ही कदमों की धूल साथ आए।
हर अहंकार का सिक्का एक दिन खोटा निकलेगा,
हर छल का महल रेत-सा बिखरेगा।
जिन आँखों में दूसरों के लिए तिरस्कार था,
वहीं पश्चाताप का दरिया उतरेगा।
जुर्माने की रकम केवल धन नहीं होती,
कभी नींद, कभी चैन, कभी मुस्कान होती।
जो दिलों को तोड़ते हैं बेपरवाही से,
उनकी रातों में भी एक सुनसान होती।
इसलिए संभल कर चलो जीवन की राहों में,
हर मोड़ छिपा है अपने ही निगाहों में।
जुर्माने की रकम तो आखिर भरनी पड़ेगी,
चाहे आज नहीं, कल—समय की पनाहों में।
— कवयित्री: मायांगलम्बम मेरिना लीमारेनबी
No comments:
Post a Comment