Tuesday, June 23, 2026

फुदकती मेंढक और उसकी चाल

 

छोटे से तालाब के किनारे,

एक मेंढक रहता था न्यारा,

फुदक-फुदक कर चलता ऐसे,

जैसे हो दुनिया का सहारा।

कभी पत्तों पर, कभी पानी में,

उसकी अपनी एक कहानी थी,

छोटी-सी देह मगर मन में,

बड़ी उड़ान की रवानी थी।

उसकी चाल अजीब सही,

पर उसमें अपना विश्वास था,

दूसरों की तरह बनने का नहीं,

उसे अपनी राह पर ही नाज़ था।

धीरे-धीरे छलांग लगाता,

हर गिरने से फिर उठ जाता,

सिखाता था ये छोटी जान,

रुकना नहीं—बस बढ़ते जाना।

फुदकती मेंढक की ये चाल,

हँसकर कहती हर एक पल,

रास्ते चाहे टेढ़े हों मगर,

अपना सफ़र ही होता सफल।

— कवयित्री: मायांगलम्बम मेरिना लीमारेनबी

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